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शहीद दिवस : शहादत की त्रिमूर्ति के अनजाने प्रतिबिम्ब

बी एम बुधौलिया (सेवा निवृत अपर संचालक मध्यप्रदेश शासन)

23 मार्च 1931 का दिन सांसारिक नैतिकता, वर्तमान न्याय व्यवस्था, प्राकृतिक न्याय व्यवस्था, नैतिक न्याय व्यवस्था के लिये कलंक दिवस ( मात्र काला दिवस मानना परिपूर्ण नहीं है ) माना जाना न्यायोचित होगा। माडर्न वर्ल्ड हिस्ट्री की शुरूआत से स्थापित किये गये समस्त नीति निर्देशक सिद्धांतों अन्तराष्ट्रीय मानव मूल्यों एवं मानव अधिकारों के संरक्षण के लिये की गई सन्धियों आदि की भावना के विरुद्ध जाकर तीन भारतीय क्रान्तिकारी भगतसिंह सुखदेव और शिवराम राजगुरू की हत्या की गई (यह लिखना कि , उनको फांसी की सजा दी गई, घटनाक्रम का युक्तियुक्त विश्लेषण नहीं करते) मानवीय की स्थापना आदि के उद्देश्य सन 1931 का पूर्व में की गई विभिन्न संधियों में इंग्लैंड भी शामिल था। अतः संधियों की शर्ते इंग्लैड पर भी लागू थी जिनकों तोड़कर इन तीनों क्रान्तिकारियों ( भगत सिंह , सुखदेव , राजगुरू ) का जीवन का अधिकार 23 मार्च 1931 छीन लिया गया था। इन तीनों पर बहुत कुछ लिखा जाता रहा है। इनको पुनः दोहराने की अपेक्षा, उन तीनों से सम्बंधित कुछ ऐसे बिन्दुओं पर प्रकाश डालना अधिक प्रेरक है जो कि “कम ज्ञात है”।

देश के समक्ष क्रान्तिकारियों की योजनाओं का अन्तिम क्रियान्वयन तथा घटनाक्रम ही आ पाया , लेकिन किन परिस्थितियों में किन भावनाओं से योजनाएं बनाई गई थी (यहां जानबूझ कर षड़यंत्र शब्द को नहीं लिखा गया है।) यह कम ज्ञात रह गये। भगतसिंह का नाम सर्वप्रथम डी.एस.पी सान्डर्स मर्डर केस में देश भर में (अन्याय करने वाले की हत्या करने वाले) हीरों के रूप में जाना गया। लेकिन इस घटना का कम ज्ञात पहलू यह है कि यह षडयंत्र लाला लाजपत राय पर लाठी चार्ज का आर्डर देने वाले सुपरिन्टेन्डेर ऑफ पुलिस स्काट (यद्यपि एसपी स्काट ने लाठी चार्ज का आर्डर देने के बाद स्वयं भी लाला लाजपतराय पर लाठी चार्ज से प्रहार किया था) की हत्या के लिये रचा गया था। योजना अनुसार भगतसिंह राजगुरू पुलिस ऑफिस के सामने की रोड पर डी.ए.वी. कालेज के स्टूडेन्ट होने का दिखावा करते हुये किताबें हाथ में लिये खड़े थे। लेकिन स्काट को ऑफिस से निकलने में बिलम्ब हो रहा था। मगर उससे पहले डी.एस.पी. सान्डर्स आफिस से निकल पड़ा। मौके की नजाकत को देखते हुऐ (पांच सेकेन्ड से भी कम समय में)

क्रान्तिकारियों राजगुरू और भगतसिंह ने यह फैसला किया किया , सान्डर्स ने भी तो लाजपतराय पर तथा अन्य आन्दोलकारियों पर लाठी प्रहार किये थे ( तथा चूंकि ज्यादा देर तक पुलिस ऑफिस के सामने खड़े होकर स्काट का इन्तजार करने पर पुलिस को शक होने की गुजाइश भी थी) अतः विरोध के लिए सान्डर्स को ही मार दिया जावे। तथा सफलता पूर्वक सान्डर्स की हत्या हो गई। डी.एस.पी. सान्डर्स को भगतसिंह व राजगुरू ने पहले भी देखा था तथा वे उसकों पहचान गये । लेकिन स्काट को ( घटना स्थल पर मौजूद क्रान्तिकारियों में ) केवल जयगोपाल ही पहचानता था जिसकों साइकिल सुधारने का दिखावा करते हुऐ खड़े रहना था और स्काट 2 बाहर आने पर साइकिल पर चढ़कर पैडल मारकर चले जाना था। लेकिन जयगोपाल भी धोखा खा गया और सान्डर्स को ही एस.पी. स्काट समझ कर साइकिल चलाकर हत्या स्थल से दूर चला गया। (यह वहीं जयगोपाल था जिसने अपने साथियों को भी धोखा दिया था। तथा बाद में मुकदमे के दौरान पुलिस का मुखबिर बन गया इसकी मुखबिरी से प्राप्त जानकारी के आधार ही भगतसिंह आदि को फांसी दी गई पुलिस गवाह बनने के बावजूद भी जयगोपाल को पांच साल की कैद की सजा दी गई यह पांच साल की कैद अंग्रेज न्यायाधीश ने दी या ईश्वरीय न्याय ने? विचारणीय है)

सम्पूर्ण देश में भगतसिंह का नाम तब छाने लगा जब कुछ अरसे के बाद 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त को केन्द्रिय ऐसेम्बली दिल्ली में बम फेंकने के बाद गिरफ्तार हो गये। बाद की घटनाओं का कई स्थानों पर वर्णन किया जा चुका है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के कतिपय बिन्दु इन शहीदों की राष्ट्रभक्ति को और अधिक प्रेरक व अनुकरणीय सिद्ध करते हैं क्रान्तिकारियों की केन्द्रिय समिति ने जब यह निर्णय लिया की देश की केन्द्रिय ऐसेम्बली में जब जनसुरक्षा कानून तथा मजदूर संरक्षण कानून पर विचार हो रहा हो तब हॉल में हानि रहित बम फेंक कर विस्फोट किया जावे तथा इन कानूनों के विरोध में ऐसेम्बली में पर्चे फेके जावें। तब जिन दो क्रान्तिकारियों को यह कार्य सौंपा गया उनमें भगतसिंह नहीं था। चन्द्रशेखर आजाद का यह मानना था कि भगतसिंह का नाम सान्डर्स मर्डर में आ चुका था इसलिए स्वयं गिरफ्तार होने पर भी उनकों फांसी निश्चित दी जावेगी। तथा क्रान्ति दल के अन्य सदस्य भगतसिंह की संगठनक्षमता तथा विचारों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने के गुणों के कारण उनकों इस योजना से दूर रखना चाहते थे।

लेकिन जब सुखदेव को यह पता चला कि भगतसिंह इस बमकाण्ड की योजना का क्रियान्वन नहीं करेंगे तब उन्होंने भगतसिंह से लंबी बहस की कि “जितने प्रभावी तरीके से तुम ( भगतसिंह ) संभावित मुकदमे के दौरान क्रान्तिकारियों का पक्ष व उद्धेश्य रखोगे तथा इसके माध्यम से सारे देश में राष्ट्रभक्ति का ज्वार ला देगे वह कोई दूसरा क्रान्तिकारी नहीं कर पायेगा। भगतसिंह यह ही चाहते थे । अतः सुखदेव के तर्को तथा भगतसिंह की इच्छा शक्ति के समक्ष झुकते हुये भगतसिंह को यह कार्य सौंपा गया । बाद के घटनाक्रम ने यह सिद्ध भी कर दिया कि सुखदेव के तर्क सही थे । तथा जब इन क्रान्तिकारियों पर मुकदमा चल रहा था तब सम्पूर्ण देश में अंग्रेजों के विरुद्ध जो उबाल चल रहा था उसका मुख्य कारण मुकदमें के दौरान न्यायाधीश के समक्ष भगतसिंह के तर्क तथा प्रभावी शब्द एवं वाणी क्षमता थी। सुखदेव बम काण्ड होने तक पकड़े नहीं गये थे उनके मन में यह टीस भी थी कि “मेरे दबाव के कारण भगतसिंह को इस षडयंत्र में लाया गया तथा उसकों मृत्युदण्ड मिलेगा आदि। बाद जब सुखदेव पकडे गये तब उनकों कुछ शान्ति तो मिली लेकिन यह भी लगता था कि मैंने कोई हत्या आदि का अपराध नहीं किया लेकिन भगतसिंह मेरे कारण दूर चला जावेगा। उनकों कुछ आत्मग्लानि जैसी होने लगी थी।

लेकिन मुकदमे का फैसला सुनाया गया। तब दूसरे नम्बर पर सुखदेव का नाम था , तथा इनकों भी धारा 121 ( Waging war against British Empire ) के अन्तर्गत फांसी सुनाई गई, तब उनका चेहरा खिल उठा। भगतसिंह और राजगुरू को मृत्युदण्ड मिलना ही था लेकिन सुखदेव का नाम सान्डर्स अन्य पुलिस वालों पर फायर करने वालों में नहीं होने के कारण उनकों मृत्युदण्ड मिलने की सम्भावना कम ही थी। राजगुरू द्वारा सान्डर्स के अलावा एक अन्य व्यक्ति की भी हत्या भ्रमवश की जा चुकी थी। वे एक मुखबिर को मारने दिल्ली आये थे। लेकिन अंधेरे में कोई अन्य व्यक्ति उनके हाथों मारा गया। (यद्यपि सान्डर्स हत्या काण्ड में उनकों मिली फांसी की पुरानी घटना से सीधा संबंध नहीं था) लेकिन नेता आजाद ने पुलिस ऑफिसर (मूलतः एस.पी. स्काट को) को मारने को योजना में राजगुरू को इसलिए शामिल किया था कि वे निडर थे तथा सबको विश्वास था कि मौके पर लेशमात्र भी हिचकेगे नहीं तथा और उस समय संभावित आकस्मिक संकटों से निपट भी लेंगे।

यह निर्णय उचित सिद्ध हुआ जब स्काट के स्थान पर सान्डर्स पहले बाहर आ गया तब तत्काल उसकों ही मारने का निर्णय लेना पड़ा। भगतसिह उस समय यह सोचते थे कि सान्डर्स पास आ जावे ताकि निशाना गलत नहीं हो मगर राजगुरु की बहादुरी यहां देखने को मिली कि उन्होंने खुद कुछ कदम आगे बढ़ कर सान्डर्स के सिर पर ही गोली मार दी ( तत्कालीन समय की मेडिकल सुविधाओं के अनुसार 3 सिर पर गोली घुसने पर मृत्यु लगभग निश्चित मानी जाती थी ) तथा सान्डर्स के जमीन पर गिरने के बाद भगतसिंह ने उसके पास जाकर 3-4 फायर कर दिये।

भगतसिंह शायद उस दिन ही पकड़ लिये जाते जब एक अंग्रेज पुलिस इंस्पेक्टर फर्न ने दौड़ उनका हाथ पकड़ ही लिया था, लेकिन इसी समय राजगुरू ने उस पुलिस इसपेक्टर फर्न को दोनों हाथों में उठा कर जमीन पर पटक दिया तथा वह चोट के कारण कुछ नहीं कर पाया (कुछ सेकेन्ड बाद हवलदार चाननसिंह को भी चन्द्रशेखर आजाद ने मार दिया था) राजगुरू यह मानते थे कि देश के लिए उनसे ज्यादा भगतसिंह की आवश्यकता है ( संभवतः इसलिये भी राजगुरू ने आगे बढ़कर सान्डर्स के मस्तक पर गोली मार दी कि भगतसिंह को गोली चलाने की जरूरत नहीं पड़ें तथा सान्डर्स मृत्यु को प्राप्त हो जावें) इसके बाद जब ऐसेम्बली में बम फैंकने की योजना बनाई जा रही थी। राजगुरू यह चाहते थे कि केन्द्रीय ऐसेम्बली में बम फेकने वालों में भगतसिंह के स्थान पर उनकों कार्य सौंपा जावे।

आजाद ने यह समझाने का प्रयल भी किया कि “सुखदेव और भगतसिंह के दबाव के कारण ही भगतसिंह को अब यह काम सौंपा जा रहा है। जितने प्रभावी ढंग से भगतसिंह स्वतंत्रता , समानता आदि समझा पायेगे वैसा राजगुरू नहीं कर पायेगे’ । आजाद ने कुछ इस आशय के तर्क भी दिये कि तुम्हारा ( राजगुरू ) नाम सान्डर्स मर्डर , केस में आ चुका है तुमको कई लोग पहचान चुके है । इसलिये ऐसेम्बली में गिरफ्तारी देने पर तुमकों ( राजगुरू ) निश्चित ही फांसी होगी हम चाहते है कि तुम बचे रहो लेकिन राजगुरू का यह तर्क था “कि भगतसिंह भी तो सान्डर्स केस में था , बाल कटा लेने से उसकी पहचान ज्यादा दिन नहीं छुप पायेगी। लेकिन भगतसिंह की जिन्दगी ज्यादा उपयोगी है आदि। ( इस तर्क वितर्क में शब्द और क्य भिन्न हो सकते है लेकिन भाव और आशय यह ही थे ) देश की स्वतंत्रता के लिये स्वयं को आगे रखने की लगन एवं प्रतिस्पर्धा बहुत कम देखने मिलती है।

विषम परिस्थितियों में भी राजगुरू का “सैन्स ऑफ हयूमर” कुछ इस प्रकार का रहा था मुकदमे की कार्यवाही पूरी है चुकी थी । तीनों को फांसी की सजा सुनाई जाना भी थी जेल में राजगुरु को निमोनिया हो गया । तब भगतसिंह ने उनसे हल्के फुलके अन्दाज में कहा कि –  तू मुझ से पहले उपर क्यों जाना चाहता है?  क्या जल्दी है? साथ साथ चलेंगे राजगुरू ने भी उसी आन्दाज में जबाव दिया “ सान्डर्स मर्डर के बाद मैं तेरा नौकर बना था। इसलिये तुझ से पहले उपर दूसरी दुनिया में जाकर घर का इन्तजाम करूंगा। साफ सफाई भी करना होगा। (पुलिस से बचने के  लिये भगतसिंह ने एक आफीसर का वेष बनाया तथा राजगुरू उनके नौकर बनकर पुलिस की आंखों से बचकर ट्रेन से दूर चले गये थे) TMLose nobntation ( orial आजाद और राजगुरू (जो दिल्ली में मुखबिर के धोखे में एक हत्या कर चुके थे) चाहते कि भगतसिंह का मुख्य उपयोग बौद्धिक प्रचार के कामों में किया जावे।

कुछ माह पश्चात क्रान्तिदल ने निर्णय किया कि दिल्ली की केन्द्रीय ऐसेम्बली में अंग्रेजों द्वारा प्रस्तुत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता विरोधी कानूनी का विरोध बम फेंक कर तथा स्वयं गिरफ्तार होकर, किया जावें। शुरू में भगतसिंह को,  उनकी इच्छा के बावजूद कार्य में शामिल नहीं किया गया बाद में सुखदेव के तर्कों को मानकर (कि जितने प्रभावी तरीके से भगतसिंह क्रान्तिदल के पक्ष रखकर, पूरे देश में राष्ट्रभक्ति का ज्वार ला देगे वैसा कोई अन्य सदस्य नहीं कर पायेगा) भगत सिंह को यह कार्य सौंपा गया। राजगुरू भी इस योजना में शामिल होना चाहते थे। प्रत्येक क्रान्तिकारी दूसरे को बचाकर स्वयं बलिदान करना चाहता था। बाद के घटनाक्रम ने सुखदेव के तर्को सही सिद्ध कर दिया।

जब भगतसिह आदि पर मुकदमा चल रहा था तब अंग्रेजी शासन के विरूद्ध देश में जो उबाल चल रहा था,  उसका मुख्य कारण भगतसिंह के प्रभावी तर्क एवं ओजस्वी प्रस्तुतीकरण था। लेकिन सुखदेव के मन टीस थी कि ” मेरे कारण भगतसिंह को फांसी होगी , तथा मैंने कोई हत्या नहीं की इसलिये कहीं बच नहीं जाऊं? ” लेकिन जब धारा 121 (ब्रिटिश राज के विरूद्ध युद्ध या अन्य कार्य) में उनकों भी मृत्युदण्ड सुनाया तब उनका चेहरा खिल उठा था। 7 अक्टूबर 1930 को न्यायालय द्वारा तीनों क्रान्तिकारियों की सुनवाई फांसी की सजा के विरुद्ध जनता सड़कों पर आने लगी। गांधीजी . मोतीलाल नेहरू , पटेल आदि भी सजा को कम कराना चाहते थे। लेकिन सुखदेव ने गांधीजी को एक पत्र लिखा उसका एक अंश मनन करने योग्य है (पढ़ लेना मात्र ही पर्याप्त नहीं है) 5 लाहौर षड़यंत्र केस के हम तीन कैदी, जो सौभाग्य से मशहूर हो गये हैं और देश की जनता की बहुत सहानुभूति प्राप्त हो गई है लेकिन हम तीनों क्रान्ति दल का बड़ा हिस्सा नहीं है। हमारा भविष्य ही उस दल के सामने एकमात्र प्रश्न नहीं है। हमारी सजा घटाने की अपेक्षा फांसी चढ़ जाने से ( जनता को अंग्रेजी राज के विरुद्ध खडे होने के उद्देश्य को ) अधिक लाभ होगा” इन क्रान्तिकारियों का देश और देश वासियों के लिये आत्मीयता , समपर्ण तथा स्नेह , फांसी के एक दो दिन पहले के घटनाक्रम से परिलक्षित हो जाता है। ( श्रीयुत

श्रीकृष्ण सरल जी के एक लेख वर्णित है, कि ” भगतसिंह की पूज्य माता श्रीमती विद्यावती जी ने उज्जैन के एक समारोह में यह बताया था। उन दिव्य आत्माओं की स्वस्फूर्त अनुमति और सहमति को मानते हुो अति संक्षेप में लिखे बिना मन नहीं मानता है ) श्रीमती विद्यावती जी राजगुरू तथा सुखदेव की माताएँ व रिश्तेदार अपने पुत्रों से अन्तिम मुलाकात करने जेल पहुंच गई थी । लेकिन उनके आने के पहले से ही सैकड़ों लोग इन तीनों क्रान्तिकारियों से मिलने जेल के मुख्य फाटक पर जमा हो गये थे। तब जेल अधिकारियों ने आर्डर सुनाया कि तीनों अभियुकों की माताओं आदि के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्तियों को मिलने नहीं दिया जावेगा।

इस आदेश के बाद बाहर जमा लोगों में उदासी छाने लगी। कुछ देर बाद ही भगतसिंह आदि क्रान्तिकारियों ने अपना निर्णय बाहर भिजवा दिया कि यदि सरकार हमें अपने देशवासियों से नहीं मिलने देंगी तब हम अपनी माताओं से भी नहीं मिलेंगे। उनका तर्क था कि “इस समय हम लोग आपने पराये का भेद नहीं कर सकते और सच पूछा जावे तो देशवासी ज्यादा सगे लग रहे है” तथा वे तीनों माताएं अपने पुत्रों से अन्तिम मुलाकात भी नहीं कर पाई इसकी उदासीं तो चेहरे पर थी लेकिन गर्व भी था। किसी ने सच ही कहा है कोई व्यक्ति कितना भी बड़ा हो जावे उन नौ माह का किराया अपनी मां को नहीं चुका सकता जो उसने मां के गर्भ में रहकर बिताये थे लेकिन लगता है कि इन शहीदों ने यह चुका दिया था और मातृभूमि का ऋण भी|

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